Read in English

जय श्री टपकेश्वर महादेव

पौराणिक, प्राचीन आदि अनादि तीर्थस्थल स्वयंभू शिवलिंग टपकेश्वर महादेव श्री गुरु द्रोणाचार्य जी की तपस्थली द्रोण गुफा, देहरादून

पौराणिक श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर, आदि अनादि तीर्थस्थल है| महाभारत युद्ध से पूर्व श्री गुरु द्रोणाचार्य जी अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए हिमालय में पहुचे, उन्हें एक ऋषिराज मिले उन्होंने ऋषिराज को दण्डवत प्रणाम किया और अपना मनोरथ व्यक्त किया| मुनि बोले “ वत्स द्रोण | निराश मत हो अब शीघ्र ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी|” गुरु द्रोणाचार्य गदगद हो गये और प्रश्न किया, “हे! मुनीश्वर ! कृपापूर्वक मुझे बताईये की भगवान शंकर के दर्शन कहाँ और कब होंगे?” ऋषि बोले, “हे द्रोण आप ऋषिकेश की ओर प्रस्थान करे, गंगा और यमुना के मध्य में पवित्र तमसा नदी बहती है| पूर्व काल में इस नदी को देवधरा के नाम से जाना जाता था| इसी नदी के किनारे दिव्य गुफा है जिस गुफा में आज टपकेश्वर नामक स्यंभू शिवलिंग विराजमान है| पूर्वकाल में इसी दिव्य गुफा में देवता लोग शिव आराधना किया करते थे और भगवान शंकर देवेश्वर महादेव के रूप में उन्हें दर्शन दिया करते थे, और मनोवांछित फलो की प्राप्ति होती थी| हे द्रोण! आप भी उसी स्थान पर जाकर भगवान शंकर की अराधना करो|

भगवान भोलेनाथ! बहुत दयालु और कृपालु है वे भक्तो के सभी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण करते है अतः तुम शीघ्र उस गुफा की ओर प्रस्थान करो” ऋषिकेश से गुरु द्रोण इस गुफा में आ पहुचे| कल-कल छल-छल करके बहती हुई पवित्र देवधरा नदी के पावन तट जहाँ शेर और हिरन बैर भाव त्यागकर एक ही घाट में पानी पी रहे थे| यह देख कर गुरु द्रोण आश्चर्य चकित हो गये| आस-पास गुफाओ में देखते है अनेक तपस्वी कठोर तपस्यारत थे| गुफा में प्रवेश करते ही सुख की अनुभूति गुरु द्रोण को हुई जिसका शब्दों में वर्णन संभव नहीं है| उन्होंने भगवान शिव को जल एवं श्वेत पुष्प अर्पित किये| गुरु द्रोण और माता कृपी तपस्या में लीन हो गये| बारह वर्ष की घोर तपस्या के पश्चात् भगवान शंकर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए और बोले, “वत्स द्रोण! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं वर मांगो| ” तब गुरु द्रोणचार्य जी भगवान शंकर से प्रार्थना करते है विश्व शान्ति के लिए धनुर्विद्या का ज्ञान आप प्रदान करे |

कहा जाता है भगवान शंकर रोज़ प्रकट होते थे और एक अध्याय धनुर्विद्या के बारे में पढ़ाते और धीरे-धीरे गुरु द्रोण को सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान प्राप्त हो गया| तत्पश्चात द्रोण की पत्नी कृपी कुछ अप्रसन्न मुद्रा में रहने लगी| एक दिन गरु द्रोण बोलो, “प्रिये! कुछ समय से देख रहा हूं तुम कुछ चिंतित सी हो मुझे इसका कारण बताओ|” द्रोण की पत्नी बोली, “हे स्वामी! आज तक तो मैं आपके साथ वन-वन भटकती रही, मुझे यह चिंता सताये जा रही है कि स्त्री के जीवन में इच्छा होती है कि वह माँ बने और उसे संतान की प्राप्ति हो|” गुरु द्रोण बोलो, “ हे प्रिये भगवान शिव का चिंतन करो वे अंतर्यामी हैं अवश्य ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी|” तत्पश्चात संतान प्राप्ति हेतु पुनः द्रोण दंपत्ति भगवान शिव की पूजा:अर्चना करने लगे| कुछ समय बाद भगवान शिव की कृपा उन्हें प्राप्त हुई और भगवान ने उनका मनोरथ पूछा उन्होंने पुत्र प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की| भगवान शंकर पुत्र प्राप्ति का वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गये| कुछ समय व्यतीत होने के बाद माता कृपी के गर्भ से सुन्दर तेजस्वी और हष्ट-पुष्ट बालक ने जन्म लिया| जन्म लेते ही उसकी आवाज अश्व की तरह थी और दूर-दूर तक उसकी आवाज गूंजी, देवताओ ने पुष्प वर्षा की| भगवान शिव की कृपा से मनोकामना पूर्ण होने के करण दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था| अश्व की तरह आवाज़ के कारण इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा| बचपन से ही बालक अश्वत्थामा तेजस्वी, नटखट और बलशाली थे| धीरे-धीरे बड़े होने लगे| एक दिन अश्वत्थामा घूमते-घूमते घोर जंगल में पहुँच गये जहाँ कुछ अन्य ऋषि कुमारो से उनकी दोस्ती हो गयी|

अब तो रोज़ खेलने के लिए बालक अश्वत्थामा जाने लगे| एक दिन उनके सखा देर से खेलने आये| अश्वत्थामा ने देरी से आने का कारण पूछा, मित्र बोला “मेरी माता गोबर से कुटिया में लिपाई कर रही थी, माँ के दोनों हाथ गोबर से सने थे, मैं दूध पीना चाहता था, माँ ने काम निपटाने के बाद मुझे स्तनपान कराया और माँ का दूध पीकर मैं आ रहा हूं|” चूँकि माता कृपी को उस दौरान दूध नहीं होता था और गुरु द्रोण के पास गाय भी नहीं थी इस कारण अश्वत्थामा को दूध नहीं मिल पता था| एक दिन बालक अश्वत्थामा जब एक ऋषिकुमार के साथ उनकी कुटिया पर पहुंचे तो देखा, उनके मित्र की माँ गाय का दूध निकाल रही है | अपने सखा के घर प्रथम बार उन्होंने दुग्ध पान किया| अश्वत्थामा जब वापस गुफा में आते है, माँ कृपी बालक को चावल का मांड पीने को देती है, तो अश्वत्थामा पीने से इंकार करते है. “मुझे अपना दूध पिलाओ”, और कहते है कृपी मन ही मन परेशान हो जाती है| आज तक मेरे बच्चे ने कुछ माँगा नहीं , आज माँगा तो मेरे पास कुछ है नहीं| जब द्रोण को सारी जानकारी हुई, तो गुरु द्रोण हाय के लिए हस्तिनापुर (वर्त्तमान मेरठ) गये| भगवान की लीला से राजा द्रुपद ने उन्हें गाय देने में अपनी असमर्थता व्यक्त की| गुरु द्रोण निराश होकर गुफा में पहुंचे, तब तक माता कृपी बच्चे को पिता के आने पर दूध देने के लिए धैर्य बंधायी हुई थी| द्रोण के आते ही आशा की किरण ही खत्म हो गयी| द्रोण ने कृपी को समझाया भगवान शंकर ही अब इसकी इच्छा को पूर्ण कर सकते है|

उन्होंने बालक को समझाया कि मैं गाय लेने गया था| किन्तु सारी-सारी गायें तो भगवान शंकर के पास है, अब तुम उन्ही की अराधना पूजा से दूध प्राप्त कर सकते हो| अश्वत्थामा के मन में भक्ति की लौ जल गई और वो एक पाँव पे खड़े होकर कठोर तपस्या करने लगे| भगवान आशुतोष शंकर उनकी परीक्षा हेतु सन्यासी के रूप में प्रकट होते है, उनका दिव्य तेज़ चारो ओर फ़ैल जाता है और उसका मनोरथ पूछते है| तब अश्वत्थामा दूध का मनोरथ बताते है| किन्तु सन्यासी अंतर्ध्यान हो जाते है| बालक निराश हो जाता है| माता पार्वती बालक की कठोर तपस्या से द्रवित हो जाती है, उधर बालक की आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है| अनायास ही आंसुओ से शिवलिंग का अभिषेक हो गया और भगवान शंकर माता पार्वती सहित प्रकट हो जाते है| पूर्णमासी में गुफा से दुग्धधारा प्रवाहित होने लगती है और शिवलिंग का अभिषेक करते हुए दूध निचे गिरता है| शिवलिंग दूधेश्वर नाम से विख्यात हुआ और अश्वत्थामा की दूध की अभिलाषा पूर्ण हुई| अब बालक अश्वत्थामा कुमार अवस्था में आ गए थे और पिता से अस्त्र-शास्त्र का ज्ञान लेने लगे थे| गुफा से प्रस्थान से पूर्व गुरु द्रोण ने सपरिवार भगवान शिव की आराधना की, “हे देवेश्वर! हे तपेश्वर! हे दूधेश्वर जिस प्रकार आपने मुझ पर कृपा की उसी प्रकार की कृपा आप कलयुग में भी रखना| मैं अज्ञानी था, आपने मुझे यश दिया, मैं नि:संतान था, आपने मुझे अश्वत्थामा सा वीर पुत्र दिया, बाल भक्ति के आगे आपने पहाड़ तक से दूध की धारा प्रवाहित कर दी|” भगवान शंकर बोले, “हे द्रोण! कलयुग में भक्तो को साक्षात् दर्शन तो नहीं मिलेंगा, किन्तु भक्तो की सभी मनोकामनाये, सच्चे मन से की गयी पूजा-अर्चना, जलाभिषेक आदि से पूर्ण होगी|” दूध का क्रम कलयुग तक चलता रहा, कलयुग के प्रभाव से लोग दूध का गलत उपयोग करने लगे| माँ पार्वती ने भगवान शंकर को महासमाधि से जगाया और भगवान शंकर ने भक्तो के कल्याण के लिए दूध की जगह जल की धारा प्रवाहित की जो गंगा जी का ही स्वरूप है| दूध की जगह पवित्र जल गिरने के कारण यह शिवलिंग टपकेश्वर महादेव के मान से प्रचलित हो गया| इसलिए गुफा के अन्दर गिरने वाले पवित्र जल को छूना मना है जिससे भगवान शंकर का अखंड अभिषेक खंडित न हो| आज भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व से श्रद्धालु इस स्वयंभू लिंग के दर्शन के लिए आते है और अपनी मनोकामना पूर्ण करते है| यह स्थान द्रोणाचार्य की तपस्थली के रूप में विख्यात है| टौंस नदी के तट पर स्थित इस प्राकृतिक स्वयंभू स्थान की छटा परम शान्ति प्रदान करती है|

महाशिवरात्रि : शिवरात्रि महापर्व में लाखो की संख्या में श्रद्धालु पवित्र शिवलिंग का अभिषेक पूजन एवं दर्शन करते है| भक्तो की लम्बी-लम्बी कतारो “ॐ नमः शिवाय” “बोल बम” “जय टपकेश्वर महादेव” के जयघोष से वातावरण और शिवमय हो जाता है| पुरे मंदिर परिसर को आकर्षक लाईटो द्वारा सजाया जाता है| इस अवसर पर एक भव्य मेला भी वर्षो से आयोजित किया जा रहा है| पुरे देश से तरह-तरह के आकर्षक झूले, मनोरंजन के साधन, हस्तशिल्प का सामान, खेल-खिलौने आदि आयोजन को और भव्य स्वरूप प्रदान करते है| सेवादल के कार्यकर्त्ता पूर्ण समर्पण भाव से सेवा कार्यो में लगे रहते है| मेला पांच दिन तक चलता है|

श्रावण मास: श्रावण मास में श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर की छटा और मनोहारी हो जाती है, कल-कल करती हुई टौंस नदी चारो तरफ सुन्दर हरियाली, “जय श्री टपकेश्वर महादेव” के जयघोष, श्रद्धालु के कमद स्वतः ही मंदिर की ओर खिचे चले आते है|

विद्वान आचार्य एवं ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानो के कल्याण के लिए श्रावण मास में विशेष पूजन, रुद्राभिषेक, महामृतुन्जय जाप आदि कुछ वर्षो से कांवड़ यात्रियों की संख्या भी बढ़ने लगी है| स्थानीय ही नहीं दिल्ली, हरयाणा, पंजाब, हिमाचल आदि राज्यों से शिवभक्त भी गोमुख ऋषिकेश या हरिद्वार से कांवड़ लेकर भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी को पवित्र गंगाजल अर्पित करते है|

भगवान श्री टपकेश्वर महादेव के श्रृंगार दर्शन एवं शोभायात्रा की प्रेरणा

108 श्री महंत मायागिरी जी महाराज जी के शुभाशीर्वाद से श्री भरत गिरी जी महाराज को भगवान के श्रृंगार का विशेष शौक है, उन्होंने फूलो व मंदिर के आस पास होने वाले सुन्दर पत्तो से नित्य सायंकालीन आरती से पूर्व भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी के श्रृंगार की परंपरा आरम्भ की| धीरे-धीरे प्रत्येक त्रयोदशी को विशेष श्रृंगार का क्रम आरम्भ हो गया| भगवान श्री टपकेश्वर महादेव के मनोहारी श्रृंगार से प्रभावित होकर धीरे-धीरे श्रद्धालु का समूह प्रत्येक त्रयोदशी जुड़ने लगा और श्रद्धा भक्ति के साथ भजन-कीर्तन, प्रसाद वितरण एवं भंडारे आदि की परंपरा आरम्भ हो गई| एक दिन पुजारी जी को भगवान श्री टपकेश्वर महादेव के देवेश्वर स्वरूप (जिसकी प्राचीन काल में देवता लोग पूजा करते थे) निर्माण की प्रेरणा हुई| एक वर्ष तक मेहनत लगन एवं श्रद्धा भाव से पांच हज़ार एक सौ इक्यावन मुखी से लेकर सात मुखी तक के रुद्राक्षो का प्रयोग किया गया|

तब श्री टपकेश्वर महादेव का दिव्य रुद्राक्षामय को भाव आया की क्यों न भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी की भव्य शोभायात्रा निकली जाये| उन्होंने इस बात की चर्चा दिगंबर कृष्णागिरी जी से की| दोनों ने महंत जी के सामने शोभायात्रा का प्रस्ताव रखा| महंत जी सहर्ष तैयार हो गए और तिथि भी तय की गई मात्र 7 दिन का समय था| यह भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी की कृपा महंत जी का शुभाशीर्वाद एवं टपकेश्वर महादेव सेवादल के कर्मठ एवं समर्पित कार्यकर्ताओ की मेहनत का ही परिणाम था कि प्रथम वर्ष में ही भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी की शोभायात्रा शहर का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन था |

पुरे शहर को दुल्हन की तरह सजाया गया था सैकड़ो द्वारो का निर्माण किया गया, संतो ब्राह्मणों, श्रद्धालुओ जन समुदाय के साथ सर्वप्रथम भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी के रुद्राक्षमय स्वरूप टपकेश्वर महांकाल को हरकीपौड़ी हरिद्वार ले जाया गया| वहां वैदिक मंत्रोच्चार के साठ टपकेश्वर महांकाल का अभिषेक एवं पूजन किया गया एयर कलशो में जल भरकर द्रोण नगरी लाया गया| उस दिन पूरी द्रोण नगरी शिवमय थी, पुरे वातावरण में “श्री टपकेश्वर महादेव” का जयघोष था| दर्जनों आकर्षक झाकियां, भक्ती संगीत, बैंड बाजे, अपने सिर ओअर कलश रखे हुए सैकड़ो माता/बहनों की टोली अध्यात्मिक बना रहे थे| एक सुसज्जित वाहान में भगवान श्री टपकेश्वर महांकाल शोभायात्रा जब टपकेश्वर महादेव पहुंची तो भगवान इंद्रडेव भी प्रसन्न हो गए और वो आसमान से जलाभिषेक करने लगे|

दुसरे वर्ष भी शोभायात्रा का तो स्वरूप ही अलग था| आयोजन का स्वरूप काफी भव्य हो गया था| शिवाजी धर्मशाला महारतपुर चौक देहरादून से मंत्रोचारण व पूजा-अर्चना के साथ हरिद्वार से अभिषेक कर लाये गए भगवान श्री टपकेश्वर महादेव को भव्य सुसज्जित वाहन में रखा गया और बड़े कलशो में लाये गए पवित्र गंगा जल को छोटे कलशो में रखकर सैकड़ो माता/बहिने सिर पर कलश रखकर शोभायात्रा के आगे-आगे चल रही थी| हाथी, घोड़े, ऊंट, रथ भक्ति संगीत गाते हुए आधा दर्जन बैंड भगवान के दिव्य स्वरूपों को प्रदर्शित करने वाली आकर्षक झाँकियो शहर के मुख्य बाजारों में दूकानदार समितियों द्वारा शोभायात्रा का भव्य स्वागत किया गया और श्रद्धालुओं हेतु हर कदम पर प्रसाद, शरबत, फलो, मिठाइयों, आइसक्रीम आदि की व्यवस्था थी| टपकेश्वर महादेव के समर्पित कार्यकर्त्ता पूर्ण लगन से पूरी व्यवस्था को निर्देशित कर रहे थे और प्रशासन उनकी मदद कर रहा था| शहर के मुख्य मार्गो से होते हुए शोभायात्रा श्री टपकेश्वर महादेव पहुंची और भगवान श्री टपकेश्वर महादेव का सामूहिक जलाभिषेक किया गया| हजारो लोगो ने भंडारे में प्रसाद प्राप्त किया और सायंकाल में विशेष श्रृंगार और आरती की|

इस वर्ष शोभायात्रा को ऐतिहासिक बनाने का प्रयास किया जा रहा है| मथुरा-वृन्दावन, बुलंदशहर, मुज़फ्फरनगर आदि स्थानों से भव्य एवं आकर्षक दर्जनों झाकियां, भगवान शिव की साक्षात् बारात, साक्षात् नंदी पर विराजमान भगवान शंकर, हाथी, ऊंट, रथ, घोड़े, भक्ति संगीत गाते देश के नामी बैंड इस वर्ष के मुख्य आकर्षण होंगे

भगवान श्री टपकेश्वर महादेव का विशेष श्रृंगार दर्शन हर माह की दोनों त्रयोदशी (प्रदोष व्रत) को बाड़े धूमधाम से यहाँ मनाया जाता है| इस रोज़ पहले देवता गण भगवान शिव की आराधना एवमेवं पूजन किया करते थे| जब देवताओ पर भगवान शिव की कृपा हुई तब देवेश्वर रूप में दर्शन हुए| इस रोज़ भगवान शिव का देवेश्वर के रूप में रुद्राक्षमय श्रृंगारदर्शन किया जाता है एवं आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है| इसी रूप की साल में एक बार भव्य शोभायात्रा श्रावण मास में निकाली जाती है|

देवताओ के बाद ऋषियों ने इस गुफा में तपस्या की| महाभारत काल के दोनों सेनाओं के कुलगुरु आचार्य द्रोनाचर्य ने भी यहाँ तपस्या की और भगवन शंकर ने तपेश्वर के रूप में दर्शन दिए एवं पाशुपत अस्त्र-शस्त्र एवं ज्ञान प्रदान किए| यह श्रृंगार सायं के समय गुरुवार एवं रविवार को किया जाता है| तृतीय प्रसंग यहाँ का आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वत्थामाकी यह गुफा जन्मस्थली एवं तपस्थली है| इसी गुफा मे अश्वत्थामा ने छह मास एक पांव के बल खड़े होकर तपस्या की थी और भगवान शंकर से दूध माँगा था|

पूर्णमासी के रोज़ शिवलिंग के ऊपर दूध की धारा बहने लगी| भगवान के चरणों से वह दूध का अश्वत्थामा ने पान किया और अपनी भूक-प्यास मिटायी| भगवान शिव के साक्षात् दर्शन किये और अमरता का वरदान प्राप्त किया| कलयुग तक इस शिवलिंग पर दूध की धारा बहती रही| तब तक यह शिवलिंग दूधेश्वर के नाम से विख्यात रहा| हर माह की पूर्णमासी में भगवान दूधेश्वर के रूप में भगवान टपकेश्वर का भव्य श्रृंगार एवं दुग्धाभिषेक किया जाता है| श्वेत रात्रि पूर्णमासी की ओर श्वेत शिवलिंग, श्वेत पुष्प, श्वेत प्रसाद, एक क्विटल ग्यारह किलो दूध का भोग आरती के पश्चात लगाया जाता है और भक्तो में यह दूध का भोग वितरण किया जाता है| अमृत तुल्य हर सोमवार को भगवान टपकेश्वर का ध्यान मुद्रा श्रृंगार किया जाता है क्योकि कलयुग के लगते ही दूध का स्वार्थ के कारण प्रयोग भगवान सदाशिव का दुष्टों पर कुपित होना क्योकि कलि के आगमन के समय प्रथम काल में सभी मनुष्य जाती वशीभूत हुई थी| तत्पश्चात भगवान शंकर ने अपनी योग भाषा से भक्तो के कल्याण हेतु उस दूध का पानी रूप दिया| तत्पश्चात जल की बूँद शिवलिंग पर टपकने लगी और अखंड अभिषेक होने लगा, तत्पश्चात भगवान शांत मुद्रा में समाधिस्थ हुए| तबसे अब तक जल की बूंदे टपकती है| इसलिए भगवान सदाशिव को टपकेश्वर कहा जाता है और यह शिवलिंग स्यंभू है|

श्रृंगार दर्शन अवश्य करे|
भगवान सदाशिव आपकी मनोकामना पूर्ण करे| जो भी भक्त श्रृंगार, आरती, एवं प्रसाद में सहयोग देना चाहते है:
त्रयोदशी को हलवा (कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष)
पूर्णमासी को दूध
गुरुवार, रविवार को बूंदी
सोमवार को मिष्ठान एवं फल-फूल
कृपया अधिक जानकारी के लिए मंदिर पुजारी से संपर्क करे:
दूरभाष- 2557837

भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी का विशेष श्रृंगार दर्शन

त्रयोदशी प्रदोष व्रत : यह व्रत शिवजी को प्रसन्न एवं प्रभुत्व प्राप्ति हेतु त्रयोदशी को किया जाता है| शिव्पोजन और रत्रिभोजन के अनुरोध से इसे प्रदोष कहते है| जो मनुष्य प्रदोष के समय शिवजी के चरण-कमल का अनन्यमन से आश्रय लेता है उसे धन-धान्य, स्त्री-पुत्र, बन्धु-बांधव और सुख संपत्ति सदैव बढ़ते रहते है| यदि कृष्ण पक्ष में सोमवार और शुक्ल पक्ष में शनिवार हो तो उस प्रदोष का विशेष फल शास्त्रों में बताया गया है|

दोनों पक्षों में त्रयोदशी को भगवान श्री टपकेश्वर महादेव का विशेष श्रृंगार एवं पूजन किया जाता है| प्रात:काल विशेष पूजन एवं सायंकाल विशेष श्रृंगार दर्शन एवं आरती का विशेष महत्त्व है| इस अवसर पर मंदिर में भजन-कीर्तनो एवं प्रसाद वितरण का कार्यक्रम भी आयोजित किया जाता है|

यों तो नित्य ही श्रद्धालु श्री टपकेश्वर महादेव का वर्षभर पूजन एवं दर्शन करते रहते है, उपयुक्त के अतिरिक्त प्रत्येक सोमवार को भी श्रद्धालु विशेष पुण्य अर्जित करते है| नित्य सायं भगवान श्री टपकेश्वर महादेव का श्रृंगार किया जाता है जो बड़ा मनोहारी व आत्मिक आनंद देता है|

भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी की कृपा से मंदिर में निर्माण कार्य जारी है, आप अपने परिवार की ओर से, अपने बुजुर्गो की स्मृति निर्माण में सहयोग प्रदान कर पुण्य अर्जित कर सकते है|

मंदिर में एक भव्य सत्संग हॉल/यात्रियों के विश्राम हेतु कमरों का निर्माण हो रहा है जिसमे आप उदार हृदय से दान देकर धर्मलाभ अर्जित कर पुण्य के भागी बने| अपने जन्म दिन, किसी पुण्यतिथि अथवा जब आपकी श्रद्धा हो आप भगवान श्री टपकेश्वर महादेव का विशेष पूजन, श्रृंगार, अथवा भंडारे का आयोजन कर सकते है|

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें
श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर, जंगम शिवालय, पलटन बाज़ार,
दूरभाष: 0135-2557837, 2650466

भगवान श्री टपकेश्वर महादेव जी का वार्षिकोत्सव भव्य शोभायात्रा
एवं सामूहिक जलाभिषेक
महाशिवरात्रि मेला
श्रावण मास विशेष पूजा
त्रयोदशी विशेष पूजन/श्रृंगार पूजा अभिषेक अथवा भंडारे, प्रसाद वितरण आदि में सहयोग हेतु पुजारी जी से संपर्क करें|


श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर,
जंगम शिवालय, पलटन बाज़ार,
दूरभाष: 0135-2557837, 2650466

शिव जी की आरती

गजानन भूत गणादि सेवितं

कपिस्थ जम्बू फल चारुभक्षणम|

उमासुतं शोकविनाशकारकं

नमामि विघ्नेश्वर यद् पंकजम||

 

ॐ जय शिव ओंकारा,भोले हर शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव...॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
तीनों रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भोले शशिधारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालन करता ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

ॐ जय शिव ओंकारा भोले हर शिव ओंकारा★★

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। ॐ हर हर हर महादेव....।।

 

 

कर्पुर गौरम करुणावतारां

संसार सारं भुजगेन्द्र हारम् |

सदा वसन्तं हृदियार्विंदे

भवं भवानी सहितं नमामि |

रुन्डाल माला कपाल काली

कपाल माला तानुमिशराय:

दिव्य देवाय दिगम्बराय

तस्मैकराय नमः शिवाय |

 

 

त्वमेव माता च पिता त्वमेवत्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव|
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेवत्वमेव सर्वं मम देव देव ||

 

ॐ महादेव शि शंकर शम्भो उमाकांत हर त्रिपुरारे |

मृत्युंजय वृष भाषिल सोभित गंगाधर मृद मदनारे |

हर शिव शंकर गौरीशं वन्दे गंगा धर मिशम् ||

शिव रुद्रं पशुपति मिशानं हर-हर काशी पुर्रनाथं |

भज पारलोचन परमात्मानंदा नीलकंठं पराभू तुम शरणम् |

शिव असुर निकंदन भव दुःख भंजन सेवक से प्रतिपाला |

बम बाबा डमनं तब भोले शंकर भज शिव बारंबारा |

जय शम्भो जय शम्भो शिव गौरी शंकर जय शम्भो ||

शिव शिवेति शिवेति शिवे शिवा

हर हरेति हरेति हरेति शिवा

भवभवेति भवेती भवेती शिवा

मृड मृडेति मृडेति मृडेति वा

भज मन: शवमेव निरंतरम् |

नमः कमलनाथाय, नमस्तेजलशायिने |

नमस्ते केशवानंद वासुदेव नमोस्तुते ||

वासनं: वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रम्प

सर्वभूत निवासैशि वसुदेव नमोस्तुते ||

नमो ब्राह्मण देवाय गोब्राह्मण हिताय च

जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमोनम: ||

आकाशात्-पतितं तौयं यथागच्छति सागरम् |

सर्वदेव नमस्कारं केशनं प्रतिगच्छति  |

केशव : क्लेश नाशाय दुःख नाशाय माघव:

हरिहश्च माघव:

हरिहश्च पाप नाशाय गोविन्दो मोक्षदायक:

अन्यथा शंरण नास्ति त्तमेव शरण मम |

तस्तात्कारुण्यभावेन रक्ष-रक्ष परमेश्वरम्

तत्पुरुषायविद्महे महादेवाय धीमहि |

तन्नोरुद्र: प्रचोदयात्

नाना सुगंध पुष्पाणी यथाकालोडभवानि च

पुष्पांजलिर्मयादत्वागृहाणपरमेश्वर:

अश्वत्थाय: सार्वत्रक्षप्रणादेवषिनणा नारद:

गंधर्वाणा सिद्धानांकपिलो मुनि: ||

 

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यतेपूर्णस्य पूर्णमादायपूर्ण मेवा वशिष्यते। 
ॐ शांति: शांति: शांतिः

***************

रुद्राष्टकम स्तोत्रम्

'ॐ नमः शिवायः

 

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥

 

निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।

करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ॥

 

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥

 

चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌ ।

मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

 

प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।

त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌ ॥

 

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।

चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

 

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्‌ ।

न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥

 

न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥

 

रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये

ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।

 

  ॥  इति श्रीगोस्वामीतुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम्

 

*********

श्री देवी जी की आरती

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया हर मंगल मूर्त,

तुमको निशदिन ध्यावत, मैया जी को सब युग ध्यावत,

हरी ब्रह्मा शिव री, ॐ जय अम्बे गौरी ||1||

 

मांग सिंदूर विराज टिको मृगमद को, मैया टिको मृगमद को |

उज्जवल से दोउ नयना, निर्मल से दोउ नयना, चन्द्रबदन निको ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||2||

 

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजे, मैया रक्ताम्बर राजे |

रक्त कुसुम वनमाला, रक्त कुसुम बनमाला, कंठन पर साजे ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||3||

 

दो भुज, चार चतुर्भुज, अष्ट भुजा शोभे, मैया अष्ट भुजा शोभे |

तीनो रूप निखरता, तीनो रूप निखरता, त्रिभुवन जग मोहे ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||4||

 

हाथनकंकण, काननकुण्ड, नकनपरमोती, मैया नकनपरमोती |

कोटिक चन्द्र – दिवाकर, कोटिक चन्द्र – दिवाकर, जिनके सम ज्योति ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||5||

 

देवीजी के सिंह ही वाहान, मैया खड्गखप्परधरी |

सुरनर मुनिजन सेवक, सुरनर मुनिजन सेवक, जिनके दुःख हारी ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||6||

 

मधु कैटभ बध करता, महिषासुर घाती, मैया महिषासुर घाटी |

धूम्र विलोचन नाशक, धूम्र विलोचन नाशक निशदिन मधुमाती ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||7||

 

दैत्यन मारे असुर संहारे, अद्भुत रूप धरे, मैया अद्भुत रूप धरे |

शुंभ- निशुम्भ विदारिनी, शुंभ- निशुम्भ विदारिनी, निर्भय राज करे ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||8||

 

चण्ड मुण्ड दो असुर संहारे शोणित बीज हरे, मैया शोणित बीज हरे |

तुम जग जननी माता तुम जग जननी , सेवक सब तारे ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||9||

 

चौंसठ योगिनी मंगल गावैं, नृत्य करैं भैरों, मैया नृत्य करे भैरो |

बाजत ताल मृदंगा, बाजत ताल मृदंगा, और बाजत डमरू ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||10||

 

कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती मैया अगर कपूर बाती |

मालखेत में राजति मालखेत में राजति, कोटि रतन ज्योति ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||11||

 

काशी में विश्वनाथ विराजत, नंदा ब्रहमचारी, मैया नंदा ब्रहमचारी |

नित उठ भोग लगावत, रूचि रूचि भोग लगावत महिमा अति भारी ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||12||

 

देवी जी आरती निसदिन पढ़ गावे, मैया सब युब पढ़ गावे |

भणत शिवानन्द स्वामी, भणत शिवानन्द स्वामी, इच्छा फल पावे ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||13||

 

 

 ॐ जय अम्बे गौरी, मैया हर मंगल मूर्त,

तुमको निशदिन ध्यावत, मैया जी को सब युग ध्यावत,

हरी ब्रह्मा शिव री, ॐ जय अम्बे गौरी ||

ॐ जय अम्बे गौरी ||14||

*******************

शिवपंचाक्षर स्त्रोतम्

ॐ नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय
दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥३॥

वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥४॥

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥६॥

 

 

******************************

लिङ्गाष्टकं स्तोत्रम्

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम
निर्मलभासित शॊभित लिंगम ।
जन्मज दुःख विनाशक लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 1
दॆवमुनि प्रवरार्चित लिंगम
कामदहन करुणाकर लिंगम ।
रावण दर्प विनाशन लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 2
सर्व सुगन्ध सुलॆपित लिंगम
बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम ।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 3
कनक महामणि भूषित लिंगम
फणिपति वॆष्टित शॊभित लिंगम ।
दक्ष सुयज्ञ निनाशन लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 4
कुङ्कुम चन्दन लॆपित लिंगम
पङ्कज हार सुशॊभित लिंगम ।
सञ्चित पाप विनाशन लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 5
दॆवगणार्चित सॆवित लिंगम
भावै-र्भक्तिभिरॆव च लिंगम ।
दिनकर कॊटि प्रभाकर लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 6
अष्टदलॊपरिवॆष्टित लिंगम
सर्वसमुद्भव कारण लिंगम ।
अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 7
सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम
सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम ।
परात्परं परमात्मक लिंगम
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिंगम ॥ 8
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठॆश्शिव सन्निधौ ।
शिवलॊकमवाप्नॊति शिवॆन सह मॊदतॆ ॥

 

******************************

शिव मानस पूजा

रत्नै: कल्पितमासनं हिम-जलै: स्नानं च दिव्याम्बरं
नाना-रत्न-विभूषितं मृगमदामोदांकितं चन्दनं ।
जाती-चम्पक-बिल्व-पत्र-रचितं पुष्पं च धूपं तथा,
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत-कल्पितं गृह्यताम् ..||||

सौवर्णे नव-रत्न-खंड-रचिते पात्रे घृतं पायसं,
भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं रम्भाफलं पानकं ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर- खंडोज्ज्वलं ,
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु !..||||

छत्रं चामरयो:युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं ,
वीणा-भेरि-मृदंग-काहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्ट-अंगं प्रणति: स्तुति: बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया,
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ! ..||||

आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं गृहं ,
पूजा ते विषयोपभोग-रचना निद्रा समाधि-स्थिति: ।
संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि: स्तोत्रानि सर्वागिरो ,
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनं ..||||

कर-चरण-कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा,
श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधं ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व ,
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ! ..||||

इति श्रीमत् शंकराचार्य-विरचिता शिव-मानस-पूजा समाप्त

 

******************************

द्वादशज्योतिर्लिंगानि

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌।

उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम्‌ ॥1

परल्यां वैजनाथं च डाकियन्यां भीमशंकरम्‌। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥2

वारणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे। हिमालये तु केदारं ध्रुष्णेशं च शिवालये ॥3

एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरेण विनश्यति ॥4

॥ इति द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तुति संपूर्णम्‌ ॥